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Saran News: तीन दशक से खंडहर हो गई मढ़ौरा की औद्योगिक धरोहर, चुनाव में नेताओं को देना होगा जवाब

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发表于 2025-10-28 10:15:59 | 显示全部楼层 |阅读模式
  

बिहार चुनाव में इंडस्ट्रियल क्षेत्र का मुद्दा  



बिपिन कुमार मिश्रा, मढ़ौरा (सारण)। कभी बिहार की औद्योगिक पहचान रहा मढ़ौरा आज वीरानी, बेरोजगारी और पलायन का प्रतीक बन चुका है। एक समय यहां की चीनी मिल, मार्टन मिल और अन्य औद्योगिक इकाइयों की गूंज से हजारों परिवारों के चूल्हे जलते थे, लेकिन अब इन मिलों के टूटे दीवार और जंग खाई मशीनें सरकार से सवाल कर रही हैं कि कब लौटेगा मढ़ौरा का औद्योगिक गौरव। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
578 एकड़ जमीन बेकार, न योजना न दिशा

मढ़ौरा चीनी मिल परिसर में करीब 578 एकड़ भूमि है जो किसी भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए पर्याप्त मानी जाती है। बावजूद इसके, पिछले तीन दशकों में इस भूमि का कोई भी रचनात्मक उपयोग नहीं हो सका।

मिल की जर्जर इमारतें और झाड़ियों से घिरी दीवारें सरकारी उदासीनता और नीति विफलता की गवाही दे रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां भूमि जैसी पूंजी पहले से उपलब्ध हो और उसका उपयोग न किया जाए, वह केवल प्रशासनिक सुस्ती नहीं बल्कि नीतिगत चूक है।
हर चुनाव में मुद्दा, हर बार अधूरा वादा

मढ़ौरा की बंद पड़ी चीनी मिल सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह कई बार चुनावी मंचों और नेताओं के भाषणों में गूंज चुकी है। प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय नेताओं तक ने इस मिल को चालू कराने या नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने का वादा किया, लेकिन नतीजा अब तक शून्य है। चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा भी ठंडे बस्ते में चला जाता है।
पड़ोसी इलाकों ने बढ़ाया कदम, मढ़ौरा पिछड़ गया

इसी क्षेत्र के अमनौर के अरना कोठी में 71 एकड़ भूमि पर फार्मास्यूटिकल पार्क का प्रस्ताव लाया गया है, वहीं तरैया में 27.5 एकड़ जमीन पर कृषि महाविद्यालय की योजना तैयार हो रही है। इसके उलट मढ़ौरा की 578 एकड़ भूमि अब भी बेकार पड़ी है। स्थानीय लोग इसे सरकार और जनप्रतिनिधियों की “प्राथमिकता की कमी” और “राजनीतिक उपेक्षा” का नतीजा मानते हैं।
खंडहर बनी मिलें, टूटी उम्मीदें और पलायन की कहानी

तीन दशक से बंद चीनी मिल और मार्टन मिल अब खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। जहां कभी हजारों मजदूरों का जीवन चलता था, वहां अब वीरानी छाई है। मिल बंद होने से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था चरमरा गई, बल्कि युवाओं को पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सरकार ने समय रहते कदम उठाया होता, तो मढ़ौरा आज बिहार का औद्योगिक हब बन सकता था।
रेल इंजन कारखाना भी नहीं पूरी कर सका उम्मीदें

मढ़ौरा में रेल इंजन कारखाना शुरू होने पर लोगों को रोजगार की बड़ी उम्मीद जगी थी, लेकिन स्थानीय युवाओं के मुताबिक इसका लाभ क्षेत्रीय स्तर पर बहुत सीमित रहा। भर्ती प्रक्रिया में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता नहीं मिलने पर लगातार असंतोष बना हुआ है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा

स्थानीय उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार सच्चे अर्थों में इच्छुक होती, तो यहां कृषि आधारित, फार्मास्यूटिकल या मध्यम उद्योगों की स्थापना आसानी से की जा सकती थी। लेकिन राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को सिर्फ “चुनावी भाषण” का हिस्सा बनाकर मतदाताओं को भ्रमित करने का काम किया।
मतदाताओं के मन में उठ रहे सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि हर चुनाव में नेताओं ने इस भूमि के पुनरुद्धार का वादा किया, लेकिन कोई ठोस पहल अब तक नहीं हुई। विभूति कुमार सिंह ने कहा कि सरकार को इस जमीन पर अन्य उद्योग लगाना चाहिए, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकें। सोनू कुमार ने कहा कि वर्षों से राजनीति की भेंट चढ़ी इस भूमि की उपेक्षा अब बंद होनी चाहिए और इसका औद्योगिक उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

निखिल भारद्वाज ने सवाल उठाया कि जब अमनौर और तरैया में फार्मास्युटिकल पार्क व कृषि महाविद्यालय की योजनाएं संभव हैं, तो मढ़ौरा में ऐसा क्यों नहीं। विवेक उपाध्याय ने कहा कि चीनी मिल को अब चुनावी नहीं बल्कि औद्योगिक मुद्दा बनाना होगा, ताकि यहां नई इकाइयां स्थापित की जा सकें।

वहीं, केके. श्रीवास्तव का मानना है कि अगर मढ़ौरा में नए उद्योग लगाए गए, तो यह न केवल अपनी खोई पहचान पाएगा बल्कि राज्य के विकसित औद्योगिक क्षेत्रों में शुमार हो जाएगा। ग्रामीणों ने एक स्वर में कहा कि अब भाषण नहीं, उद्योग चाहिए।
117- मढ़ौरा विधानसभा क्षेत्र

मतदान केंद्रों की संख्या 333
पुरुष मतदाता 1,42,920
महिला मतदाता 1,27,416
अन्य 0
कुल 2,70,336
सेवा मतदाता की संख्या 852
दिव्यांग मतदाता की संख्या 3004
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