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विचार: वंदे मातरम् पर व्यर्थ का विवाद, 150 पूरे होने पर वर्ष भर मनाया जाएगा उत्सव

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发表于 2025-11-26 22:47:05 | 显示全部楼层 |阅读模式
  



संजय गुप्त। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र गीत वंदे मातरम् के 150 पूरे होने को एक उत्सव के रूप में वर्ष भर मनाने का फैसला कर यही रेखांकित किया कि उनकी सरकार राष्ट्रीयता के प्रति विशेष अनुराग रखती है और वह प्रत्येक अनुकूल अवसर को राष्ट्रबोध जगाने के लिए उपयोग करती है। यह उनकी गहरी दृष्टि और दूरगामी सोच को प्रकट करता है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की ओर से रचित कालजयी गीत वंदे मातरम् से संबंधित उत्सव का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने जिस तरह स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी करने के साथ एक विशेष वेबसाइट लांच की, उससे यही पता चलता है कि वे इस अवसर को कितना महत्व दे रहे हैं। इस मौके पर दिए गए भाषण में उन्होंने वंदे मातरम् को एक मंत्र, एक संकल्प, एक साधना, अराधना आदि बताते हुए उसे वर्तमान से भी जोड़ा और कहा कि यह विकसित भारत के सपने को पूरा करने की प्रेरणा देने वाला है।

निःसंदेह यदि देशवासी भारत को उन्नत बनाने के लिए समर्पण की उसी भावना से लैस हो जाएं, जिसका परिचय उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के समय वंदे मातरम् के उद्घोष के सहारे दिया था तो विकसित भारत के लक्ष्य को आसानी से हासिल किया जा सकता है। उस समय यह गीत पहले बंगाल और फिर पूरे देश के लिए स्वतंत्रता, आत्मसम्मान, त्याग, देशभक्ति और देशसेवा के प्रति संकल्प का पर्याय बन गया था। इसने लाखों लोगों को स्वतंत्रता के लिए त्याग और संघर्ष करने को प्रेरित किया।

विश्व इतिहास में ऐसे किसी गीत का उल्लेख कठिनाई से ही मिलता है, जिसने करोड़ों लोगों को आंदोलित करने के साथ उन्हें आत्मबल प्रदान किया हो। ऐसा तब हुआ, जब वंदे मातरम् बांग्ला मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखा गया। 1882 में बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंद मठ में वंदे मातरम् का प्रकाशन होते ही वह लोगों के आत्मा में रच-बस गया। इस गीत की खूबी यह रही कि इसने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सभ्यतागत गौरव के साथ जोड़ने का काम किया।

इसी कारण देश के साथ विदेश में भी वह स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। इसका प्रभाव इतना अधिक बढ़ा कि वह स्वतंत्रता संघर्ष के उद्घोष वाक्य में बदल गया। इससे घबराकर अंग्रेजी सत्ता ने उसे प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन इससे उसकी लोकप्रियता और अधिक बढ़ी। इसी के साथ बढ़ा जनमानस की चेतना पर उसका प्रभाव। इस गीत की सराहना रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, अरबिंदो आदि ने की। इसे कांग्रेस के अधिवेशनों में राष्ट्र गीत के रूप में गाया जाने लगा।

स्वतंत्रता संघर्ष के दौर में कई पत्र-पत्रिकाओं ने वंदे मातरम् नाम से अपना प्रकाशन शुरू किया। इनमें से कुछ तो उर्दू भाषा के थे। इसके अतिरिक्त यह कई क्रांतिकारियों के बीच अभिवादन का विकल्प बन गया। एक तरह से यह स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रबल स्वर बना। वंदे मातरम् की महत्ता इससे भी समझी जा सकती है कि उसे राष्ट्रीय ध्वज के प्रारंभिक स्वरूप में भी स्थान मिला। जब यह गीत स्वतंत्रता के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ था, तब संकीर्ण राजनीतिक कारणों से उसका बेतुका विरोध भी हुआ।

मुस्लिम लीग ने उसे इसलिए सांप्रदायिक बताना शुरू कर दिया, क्योंकि इसमें भारत को एक माता के रूप में चित्रित किया गया था और उसकी आराधना पर बल दिया गया था। चूंकि कांग्रेस मुस्लिम लीग को संतुष्ट करना चाहती थी, इसलिए उसने वंदे मातरम् को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता तो दी, लेकिन उसके छह में से प्रथम दो छंदों को ही। शेष चार छंदों में ऐसा कुछ नहीं था, जिसे सांप्रदायिक कहा जा सकता। यदि ऐसा होता तो गांधी जी यह न कहते कि वंदे मातरम् बंगाल के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सबसे शक्तिशाली युद्धघोष और साम्राज्यवाद विरोधी नारा था।

नेहरू जी ने भी कहा था कि यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ है। इसके बाद भी कांग्रेस की ओर से उसके दो छंद ही राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकृत किए गए। गत दिवस प्रधानमंत्री ने इसका ही उल्लेख करते हुए कहा कि यहीं से विभाजनकारी राजनीति के बीज बोए गए। वंदे मातरम् से जुड़े इस विवाद के बाद भी संविधान सभा ने उसे राष्ट्रीय गीत और जन गण मन को राष्ट्रीय गान के रूप में मान्यता दी। इससे यह समझा जा सकता है कि इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन में कितनी महती भूमिका निभाई।

अतीत में जन गण मन को लेकर भी ऐसी टिप्पणियां करके विवाद उठाए गए हैं कि उसकी रचना ब्रिटिश शासक के गुणगान के लिए की गई थी। अभी हाल में कर्नाटक के एक भाजपा सांसद ने फिर से ऐसा कहा। इस तरह की बातों से बचा जाना चाहिए। राष्ट्र गीत और राष्ट्र गान को बराबर सम्मान दिया जाना चाहिए। यह सभी को सुनिश्चित करना चाहिए कि न राष्ट्रीय गीत की अवहेलना हो और न ही राष्ट्र गान की। दुर्भाग्य से ऐसा रह-रहकर होता रहता है।

कई बार संसद में कुछ सांसद वंदे मातरम् के गायन में शामिल नहीं होते। यह ठीक नहीं कि वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री की ओर से वर्ष भर चलने वाले आयोजन का शुभारंभ किए जाते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों ने वंदे मातरम् को कभी सम्मान नहीं दिया। आखिर जब दोनों दल वंदे मातरम् की महत्ता से सहमत हैं और उसे राष्ट्र की चेतना को जगाने वाला गीत मानते हैं तो आरोप-प्रत्यारोप क्यों?

महाराष्ट्र में सपा नेता अबू आजमी ने वंदे मातरम् को धार्मिक गीत बताते हुए जिस तरह उसे गाने से इन्कार कर दिया, उससे पता चलता है कि कुछ लोग किस तरह राष्ट्रीय महत्व के प्रतीकों के सहारे विभाजनकारी राजनीति करने के आदी हो गए हैं। अबू आजमी ने वंदे मातरम् को नमाज के समतुल्य बताया।

यह खेद की बात है कि जब भी कभी वंदे मातरम् को मान-सम्मान देने या फिर उसका स्मरण करने की पहल होती है, उसके खिलाफ कुछ बेतुके स्वर उभर ही आते हैं। महाराष्ट्र के अलावा ऐसे स्वर जम्मू-कश्मीर में भी सुनाई दिए हैं। ऐसे अवांछित-अनावश्यक स्वरों से वंदे मातरम् की महत्ता-लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। यह अवश्य हो सकता है कि भाजपा ऐसे स्वरों को अपने पक्ष में भुनाने के लिए सक्रिय हो।
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