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अब मेरठ के किस उत्पाद को मिल गया GI Tag? कैंची को तो आठ साल पहले ही मिल गया था भौगोलिक संकेत

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发表于 2025-11-26 23:29:21 | 显示全部楼层 |阅读模式
  



जागरण संवाददाता, मेरठ। क्रांति धरा मेरठ के बिगुल को विश्व में पहचान मिल गई है। चेन्नई स्थित भारत सरकार की संस्था जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ने यह टैग मेरठ केे बिगुल काे प्रदान किया है। यह संस्था बैद्धिक संपदा का पंजीकरण करती है। मेरठ वाद्य यंत्र निर्माता विक्रेता व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन पिछले दो साल से इसके लिए प्रयास रत थी। नाबार्ड उप्र और जिला प्रशासन के माध्यम से जीआइ टैग के लिए आवेदन किया गया था। जी आई टैग स्वीकृत होने से स्थानीय कारीगरों और उद्यमियों में खुशी की लहर है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

यह होता है जीआइ टैग
जीआइ टैग या भौगोलिक संकेत किसी उत्पाद के लिए एक प्रकार पहचान है। जो उत्पाद को भौगोलिक मूल स्थान से जोड़ता है। जैसे बनारस की साड़ी, बासमती चावल। यह टैग उत्पाद की गुणवत्ता और प्रतिष्ठा की गारंटी की तरह होता है। एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहित चोपड़ा और सचिव ओवैस रहमतुल्ला ने बताया कि बिगुल को मेरठ का जीआइ टैग दिलाने में जी आइ मैन आफ इंडिया के नाम से प्रसिद्ध पद्मश्री डा. रजनी कांत ने भी सहयोग और मार्गदर्शन किया।

मेरठ अपने संगीत वाद्य यंत्र निर्माता के रूप में पूरी दुनिया में जाना जाता है और आज भी बड़ी संख्या में यहां से बिगुल, ट्रांपिट, ड्रम सहित 10 अलग अलग तरह के म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बनते हैं। इन्हें भारत के कोने में जाते हैं। निर्यातकों के द्वारा कई म्युजिकल इंस्ट्रूमेंट का विदेशों में भी निर्यात होता है।

स्कूलों से ले कर सभी सेना, पुलिस, में भी नियमित रूप से बिगुल बजा कर ही शुरुआत होती है । एसोसिएशन ने मेरठ के में निर्मित ट्रम्पेट और यूपोनियम को जी आइ पंजीकरण प्रदान करने के लिए आवेदन किया है। ऐसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि मेरठ वाद्य यंत्रों को एक जिला एक उत्पाद की श्रेणी में शामिल किया जाए जिससे इसका तेजी विकास हो सके।


मेरठ में बिगुल बनाने की शुरुआत अंग्र्रेज हुकूमत के दौर में 1830 में हुई थी। जब उन्होंने फौज के बैंड के लिए वाद्य यंत्र मेरठ के कारीगरों से बनवाने शुरु किए थे। जली कोठी में बड़ी संख्या में कारीगर रहते हैं।

मेरठ की कैंची को आठ साल पहले मिला था जीआइ टैग

मेरठ को पहला जीआइ टैग दिलाने का गौरव यहां की कैंची से मिला था। 2017 में कैंची को जीआइ टैग मिला। मेरठ सीजर मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन की ओर से इसके लिए आवेदन किया गया था। एसोसिएशन के अध्यक्ष शरीफ अहमद ने बताया कि 350 साल पुराना उनका कैंची का उद्याेग है। वह सातवीं पीढ़ी हैं। 1956 के गजेटियर में भी उनके पूर्वजों द्वारा कैंची निर्माण का उल्लेख है।

रेवड़ी, खद्दर, बैंडबाजा का भी हुआ है आवेदन

जीआइ टैग के लिए मेरठ की रेवड़ी, बैंडबाजा, खद्दर व मुंडाली के ग्लास-बीड्स के लिए भी कुछ साल पहले आवेदन किया गया था। हालांकि अभी यह प्रक्रिया में हैं।
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