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यूपी में दलित को अपना मानकर OBC-अल्पसंख्यक को साधने में जुटी बसपा, भाईचारा समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू

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发表于 2025-11-26 23:00:16 | 显示全部楼层 |阅读模式
  

ओबीसी-अल्पसंख्यक से रिश्ते मजबूत करने में जुटी बसपा।



पंकज मिश्र, हरदोई। बहुजन समाज पार्टी के नेता ही नहीं कार्यकर्ताओं में भी उत्साह दिख रहा है। लखनऊ में हुई रैली के बाद उत्साहित नेता पार्टी को मजबूती देने में जुट गए हैं। कैडर वोट पर तो पार्टी का ध्यान है ही, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग को जोड़ने की जिम्मेदारी भाई चारा समितियों को दी गई है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

ओबीसी भाई चारा समिति हर विधान सभा में पांच-पांच हजार सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा है। मंडल स्तर पर अल्पसंख्यक भाई चारा गठित होने के बाद अब जिला स्तर पर अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति की तैयारी है।

लोक सभा चुनाव परिणाम के बाद बसपा शांत थीं। परिणामों से नेताओं में निराशा जरूर थी, लेकिन अब वह ऊर्जा में बदल रही है। बसपा ने अपनी सामाजिक इंजीनियरिंग की पुरानी राह को नए सिरे से बनाना शुरू कर दिया है।

दलित वोट बैंक को अपनी मजबूत नींव मानते हुए पार्टी अब ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के बीच संगठनात्मक पकड़ बढ़ाने में जुटी है। इसी दिशा में बसपा ने ओबीसी भाईचारा समिति का गठन करने के बाद अब अल्पसंख्यक भाईचारा समिति के गठन की तैयारी की है।

ओसीबी भाई चारा समिति के रणधीर बहादुर और मुकेश वर्मा जिला संयोजक बनाए गए हैं। उनका कहना है कि ओबीसी भाई चारा समिति अन्य पिछड़ी जातियों जैसे कुर्मी, मौर्य, निषाद, कश्यप, लोध आदि को जोड़ने में जुट गई है।

बसपा जिलाध्यक्ष सुरेश चौधरी कहते हैं कि ओबीसी भाई चारा समिति के बाद इसी के समानांतर पार्टी ने अब अल्पसंख्यक भाईचारा समिति के गठन की भी प्रक्रिया शुरू की है। इन समितियों के कार्यक्रमों की योजना से लेकर उनके आयोजन तक की जिम्मेदारी सीधे जिला और सेक्टर स्तर के बसपा पदाधिकारियों को सौंपी जा रही है।

इसका मकसद है कि पार्टी का सीधा संपर्क बूथ स्तर तक पहुंचे और समाज के प्रभावशाली वर्गों में संगठन की पकड़ बने। वहीं राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सपा पीडीए पर राजनीति कर रही है। बसपा का भाई चारा उसी का जवाब देने को तैयार हो रहा है। दलित तो बसपा का कैडर वोट है। पार्टी उसे अपना ही मान रही है।

ओबीसी और अल्पसंख्यक को भाई चारा समितियां जोड़ेंगी। सपा अपने पीडीए के नाम पर बसपा के पारंपरिक मतदाताओं में सेंध लगाने की कोशिश करेगा, इसलिए भाईचारा समितियां एक तरह से इस सेंध को रोकने की दीवार बनेंगी।
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