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Dhanteras 2025: धनतेरस और शनि त्रयोदशी का शुभ संयोग, जरूर पढ़ें ये कथा और आरती

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Pradosh Vrat Katha: शनि त्रयोदशी की कथा।



धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Dhanteras 2025: दीवाली के पांच दिवसीय महापर्व की शुरुआत धनतेरस के साथ होती है। इस दिन धन के देवता कुबेर, आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस साल धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर, दिन शनिवार यानी आज मनाया जा रहा है। कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि जब शनिवार को पड़ती है, तो इसे शनि त्रयोदशी या शनि प्रदोष कहा जाता है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

इस दुर्लभ महासंयोग में की गई पूजा से धन, स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस संयोग और शुभ बनाने के लिए प्रदोष व्रत की कथा और आरती का पाठ जरूर करें, जो इस प्रकार हैं।
प्रदोष व्रत की कथा ( Pradosh Vrat Katha)

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हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार अंबापुर गांव में एक ब्रह्माणी रहती थी। उसके पति का निधन हो गया था, जिस वजह वह भिक्षा मांगकर अपना जीवन व्यतीत कर रही थी। एक दिन जब वह भिक्षा मांगकर लौट रही थी, तो उसे दो छोटे बच्चे मिलें जो अकेले थे, जिन्हें देखकर वह काफी परेशान हो गई थी। वह विचार करने लगी कि इन दोनों बालक के माता-पिता कौन हैं? इसके बाद वह दोनों बच्चों को अपने साथ घर ले आई। कुछ समय के बाद वह बालक बड़े हो गएं। एक दिन ब्रह्माणी दोनों बच्चों को लेकर ऋषि शांडिल्य के पास जा पहुंची। ऋषि शांडिल्य को नमस्कार कर वह दोनों बालकों के माता-पिता के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की।

तब ऋषि शांडिल्य ने बताया कि \“\“हे देवी! ये दोनों बालक विदर्भ नरेश के राजकुमार हैं। गंदर्भ नरेश के आक्रमण से इनका राजपाट छीन गया है। अतः ये दोनों राज्य से पदच्युत हो गए हैं।\“\“ यह सुन ब्राह्मणी ने कहा कि \“\“हे ऋषिवर! ऐसा कोई उपाय बताएं कि इनका राजपाट वापस मिल जाए।\“\“ जिसपर ऋषि शांडिल्य ने उन्हें प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। इसके बाद ब्राह्मणी और दोनों राजकुमारों ने प्रदोष व्रत का पालन भाव के साथ किया। फिर उन दिनों विदर्भ नरेश के बड़े राजकुमार की मुलाकात अंशुमती से हुई।

दोनों विवाह करने के लिए राजी हो गए। यह जान अंशुमती के पिता ने गंदर्भ नरेश के विरुद्ध युद्ध में राजकुमारों की सहायता की, जिससे राजकुमारों को युद्ध में विजय प्राप्त हुई। प्रदोष व्रत के प्रभाव से उन राजकुमारों को उनका राजपाट फिर से वापस मिल गया। इससे प्रसन्न होकर उन राजकुमारों ने ब्राह्मणी को दरबार में खास स्थान दिया, जिससे ब्राह्मणी भी सुखी जीवन जीने लगी और भोलेनाथ की बड़ी उपासक बन गई।
॥शिवजी की आरती॥

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

दो भुज चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहे ।

त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।

चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक, भूतादिक संगे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

कर के मध्य कमंडल, चक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका ॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

त्रिगुणस्वामी जी की आरति, जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानंद स्वाम, सुख संपति पावे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा...

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
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