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JDU Candidate Gopalpur: नीतीश कुमार ने बुलो मंडल पर क्यों जताया भरोसा? मुंह ताकते रह गए गोपाल मंडल, गोपालपुर में सियासी ड्रामा

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JDU Candidate Gopalpur: नीतीश कुमार ने भागलपुर जिले के गोपालपुर सीट से गोपाल मंडल का टिकट काटकर बुलो मंडल को जदयू उम्मीदवार बनाया।



संजय सिंह, भागलपुर। JDU Candidate Gopalpur गोपालपुर विधानसभा सीट इस बार किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं दिख रही है। ड्रामा, सस्पेंस और राजनीतिक चालबाजियों से भरी इस सीट पर जदयू ने अपने पुराने चेहरे और नए दावेदार का ऐसा खेल किया है, जो चुनाव को पूरी तरह रोमांचक बना देगा। पूर्व सांसद शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल को पार्टी ने टिकट दिया है, लेकिन इस सीट पर पहले विधायक गोपाल मंडल काबिज थे। इस बार उन्हें बाहर कर दिया गया और अब वह निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

गोपाल मंडल कहते हैं कि नीतीश कुमार उनके नेता हैं, लेकिन टिकट कटने के बावजूद उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे जनता की अदालत में जाकर अपनी ताकत दिखाएंगे। यानी, गोपालपुर विधानसभा अब दो बड़े नेताओं के बीच सीधी भिड़ंत का मैदान बनने जा रही है। लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। जदयू सांसद अजय मंडल भी इस सियासी खेल में कूद गए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर सदस्यता से इस्तीफा लेने की अनुमति मांगी है।

अजय मंडल का कहना है कि बुलो मंडल ने उनके चुनाव में विरोध किया और हराने की पूरी कोशिश की। अब जब उन्हें टिकट मिला है, तो वे विरोध करेंगे। यानी बुलो मंडल को न केवल गोपाल मंडल की चुनौती झेलनी है, बल्कि अपने ही सांसद का विरोध भी सामना करना पड़ेगा। गोपालपुर सीट सियासी झूला बन रही है। एक तरफ बुलो मंडल हैं, जिनके पास पार्टी का पूरा समर्थन है और संगठन में पकड़ मजबूत है। दूसरी तरफ गोपाल मंडल, जो जनता में अपनी पकड़ दिखाकर निर्दलीय के रूप में मैदान में उतर रहे हैं। और बीच में अजय मंडल का विरोध इसे और पेचीदा और रोचक बना देता है।

गोपालपुर का यह चुनाव केवल उम्मीदवारों की लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर सियासी लड़ाई और व्यक्तिगत झगड़े पर भी टिका है। जनता तय करेगी कि पार्टी ने सही चुनावी दांव खेला या गोपाल मंडल की स्थानीय पकड़ निर्णायक साबित होगी। गोपालपुर में जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और विकास के नाम पर किए गए वादे मतदान को निर्णायक बना सकते हैं। बुलो मंडल और गोपाल मंडल दोनों ही सक्रिय हैं और अपने-अपने समर्थकों के साथ मैदान में धावा बोलने को तैयार हैं।

इस चुनाव को मजेदार बनाने वाली बात यह है कि यह सीट बुलो मंडल बनाम गोपाल मंडकी कहानी बन चुकी है, जिसमें तीसरा पक्ष अजय मंडल का विरोध इसे त्रिकोणीय संघर्ष बना देता है। वोटर्स के लिए यह सीट अब सियासी ड्रामा और रोमांच का पिटारा बन गई है। अगले कुछ हफ्तों में प्रचार, रैलियां और स्थानीय हलचल इस चुनाव को और रोचक बनाएंगी। गोपालपुर विधानसभा इस बार केवल जीतने या हारने का चुनाव नहीं है, बल्कि यह दिखाने का मौका भी है कि कौन कितना मजबूत है, जनता किसे चुनती है और सियासी दांव किस पर भारी पड़ते हैं।
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