CasinoGames 发表于 2025-10-28 09:24:30

माटी की सुवास से महकने लगा दीपावली का बाजार, चाक ने बढ़ाई गत‍ि

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माटी से जुड़े त्योहार को लेकर मिट्टी के दीयों का बाजार उत्साहित है।



शिवम सिंह, जागरण वाराणसी। श्रीसमृद्धि कामना की दीप ज्योति पर्व शृंखला की दस्तक घर-बाजार में महसूस की जाने लगी है। धनतेरस के साथ 18 अक्टूबर को ज्योति कलश छलक उठेंगे। इसके साथ ही धन्वंतरि जयंती, हनुमान जयंती, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, अन्नकूट जैसे पर्व-उत्सवों की धूम होगी। माटी से जुड़े त्योहार को लेकर मिट्टी के दीयों का बाजार उत्साहित है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

परंपरा को बनाए, बचाए रखते हुए पर्यावरण अनुकूल डिजाइनर दीये तक रोशन होेने को तैयार हैं। इनसे इस कारोबार से जुड़े कुम्हारों की रोजी को धार तो मिले ही स्वदेशी का संकल्प भी रोशन होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वदेशी अर्थात् ‘लोकल फार वोकल’ के आह्वान और हर एक में जगे इस भाव ने कुम्हा व स्वयं सहायता समूहों में उत्साह का संचार किया है।

कारण यह कि इस साल मिट्टी के दीयों की मांग में 30 से 50 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया जा रहा तो कमाई भी दोगुनी होने की उम्मीद है। पहले एक कुम्हार त्योहार में 60,000 रुपये तक कमाई करता था तो इसका आंकड़ा सवा लाख तक जाने का अनुमान है। इसके लिए परंपरागत दीपों के साथ डिजाइनर दीयों पर भी खूब काम किया जा रहा है। इसमें हर जेब का ख्याल रखते हुए आकार दिया जा रहा है। देवदीपावली के लिए भी कुम्हारों के वर्कशाप में रतजगा शुरू होगा।

पिछले साल की अपेक्षा 50 प्रतिशत मांग बढ़ी है। अब 60 की बजाए एक लाख 20 हजार रुपये की कमाई की उम्मीद है। इसी के अनुसार विभिन्न डिजाइन के दीयों का निर्माण किया गया है। -गोविंद प्रजापति, भट्ठी लोहता।

पहले हाथ के चाक पर दीया बनाते थे। एक घंटे में 400 दीये बनते थे। अब 800 बना लेते हैं। पिछले साल 10 हजार कमाई किए थे। इस बार 20 से 25 हजार रुपये की उम्मीद है। -राजू प्रजापति, भट्ठी लोहता।

दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज को लेकर मिट्टी के तरह-तरह के दीये बनाए गए हैं जिसकी वजह से डिमांड भी अधिक है। स्वदेशी आह्वान को ध्यान में रखकर सामग्री का निर्माण कराया गया है। मोमबत्ती की अपेक्षा हम लोगों के सामान न सिर्फ सस्ते हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल है। -सुनीता देवी, लोहता।



हरहुआ के चक्का, आयर, शिवरामपुर, कुरौली और पुआरी खुर्द के कुम्हार गुलाब, मुन्ना, इंद्रजीत और चंदा देवी दीये और घरिया 70-80 रुपये प्रति सैकड़ा बेचते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दीयों की मांग 25-30% बढ़ी है। दीपावली पर मिट्टी के गणेश-लक्ष्मी की मांग है। दीपावली और देव दीपावली के अवसर पर वाराणसी के चोलापुर, बड़ागांव और हरहुआ ब्लाकों के कुम्हारों के चेहरों पर भी रौनक है।

मिट्टी के दीयों की मांग में इस बार उछाल देखने को मिला है। चोलापुर के टिसौरा, कपिसा और महमूदपुर के कुम्हार श्यामजी, संजय, राजेश, सुनील और रामजी प्रजापति ने बताया कि पिछले वर्ष 32 हजार दीयों का आर्डर था, जो इस बार बढ़कर 48 हजार हो गया है। पिछले साल 50 रुपये प्रति सैकड़ा बिकने वाले दीये इस बार 60 रुपये तक बिक रहे हैं।

बड़ागांव के बिसईपुर, करमपुर और कूडी के कुम्हार मनोज, गोरख, कल्लू और रमेश प्रजापति कुल्हड़, पुरवा, कसोरा और दीये बनाते हैं, जो 60-70 रुपये प्रति सैकड़ा बिकते हैं। रमेश ने बताया कि सरसों के तेल वाले दीयों का चलन कम हो रहा है।

दीपावली पर बच्चों के खेलने के लिए आइटम

घर : 100-200 रुपये

डोरेमान : 50 रुपये

मोटू-पतलू : 100

जाता : 50 रुपये

विभिन्न डिजाइन के दीये व दाम

डिजाइन दीया : दाम

स्वास्तिक : 80 रुपये

बड़ा दीया : 60 रुपये सैकड़ा

मंझला दीया : 50 रुपये सैकड़ा

छोटा दीया : 40 रुपये सैकड़ा

परई : 100 रुपये सैकड़ा

गुल्लक : 40-60 रुपये

चार दीये वाला परई : 30-500
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