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Bihar Election 2025: कहीं परिवार तो कहीं साझीदार, हर मोर्चे पर घिरते दिख रहे तेजस्वी यादव

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अपनों से ही घिरते दिख रहे तेजस्वी



सुनील राज, पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के नामांकन की जारी प्रक्रिया के बीच पहले बाजी मारते हुए एनडीए ने सहयोगी दलों के साथ सीटों पर समझौता कर लिया है, लेकिन दूसरी और महागठबंधन में सीटों के तालमेल को लेकर जो गिरहे उलझी हैं, वह अब तक सुलझाई नहीं जा सकी हैं।विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

संभावना दिख रही है की आज शाम (सोमवार) तक महागठबंधन भी सीटों के विवाद को सुलझा लेगा और सहयोगी दलों के साथ तालमेल हो जाएगा।

सीटों के तालमेल के बाद भी राजद के प्रमुख नेता और महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी की चुनावी राह बहुत आसान नहीं होने वाली जैसा कुछ समय पहले तक दिख रहा था। 243 सदस्यीय विधानसभा की राजनीतिक गुत्थी में अब कई नए और पुराने कारक एक साथ काम कर रहे हैं।

सबसे अहम कारकों में एक प्रमुख कारक हैं प्रशांत किशोर (पीके) की सक्रियता। इसके अलावा पारिवारिक कलह, कांग्रेस के साथ सीट-बंटवारे के पेच और मुक़ाबले में मुकेश सहनी की मांगें शामिल हैं।
सीट शेयरिंग पहली प्राथमिकता

फिलहाल तेजस्वी इस कोशिश में जुटे हैं कि महागठबंधन में उलझा सीट बंटवारे का मामला जल्द से जल्द सुलझा लिया जाए। सहयोगी दलों को कितनी सीटें दी जाएं इस पर कड़ा मंथन लगातार जारी है। प्रतिद्वंद्वी एनडीए ने जल्दबाजी में अपना फार्मूलाफाइनल कर लिया है।

भाजपा और जदयू दोनों को 101-101 सीटों पर मैदान में उतरेंगे। लोजपा राम विलास 29, हम और रालोमो 6-6 सीट पर उम्मीदवार देंगे। अब तेजस्वी की चुनौती है कि वह सीट बंटवारे का मसला प्राथमिकता में सुलझाएं।
चुनौतियां और भी हैं

सीट बंटवारे की गुत्थी सुलझाने के बाद तेजस्वी यादव को अपना सारा फोकस पारिवारिक द्वंद्व सुलझाने पर लगाना होगा। असल में परिवार का अंदरूनी मतभेद, तेजप्रताप यादव द्वारा तेजस्वी को सोशल मीडिया पर अनफॉलो करना और अपने अलग राजनीतिक दल बनाना राजद को नुकसान पहुंच सकता है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां यादव वोट का विभाजन निर्णायक होता है।

इन समस्याओं के अलावा सत्ता तक पहुंचाने की कोशिशें में प्रशांत किशोर की चुनावी उपस्थिति और जनसुरज की पहल ने विरोधी समीकरणों को बदल दिया है। सर्वे में भी पीके या उनके गठजोड़ को एक आशंकाजनक विकल्प के रूप में परखा जा रहा है, जिससे तेजस्वी की लोकप्रियता का सार्थक वोट-अनुवाद कठिन हो सकता है।

इसके अतिरिक्त वीआइपी नेता मुकेश सहनी ने महागठबंधन की सीटों की गणना को और पेचीदा बना दिया है। विश्लेषकों का अनुमान है कि महागठबंधन को सहनी को किसी भी हाल में साधना होगा, क्योंकि महागठबंधन की एकता और निषाद वोटों के समीकरण को अपने पाले में करने के लिए यह आवश्यक है।

इसके बाद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के विरुद्ध भी उन्हें अपनी रणनीति बनानी होगी, क्योंकि सीमांचल में ओवैसी राजद-कांग्रेस के लिए चुनौती का सबब हो सकते हैं।

तेजस्वी अगर इन बाधाओं को समय रहते पर कर लेते हैं हैं तो उन्हें सिर्फ मैदानी मुकाबले पर फोकस करना रहेगा। क्योंकि उनके सामने फिर कोई संकट नहीं होगा। सिर्फ एनडीए को कड़ा मुकाबला देना ही प्राथमिकता होगी।
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